What to Do and What Don’ts ? क्या करें और क्या नहीं ?

What to Do and What Don’ts ?  क्या करें और क्या नहीं ?


  संदेह, भय, भ्रांति , कटुता, बेईमानी, भ्रष्टाचार, अनैतिकता आदि से लिप्त इस संसार का भविष्य वर्तमान में , बहुत ही अधिक अनिश्चित और अंधकारमय दिखाई पड़ता है। हमारे जीवन में आध्यात्मिक, नैतिक और सामाजिक मूल्यों की  शून्यता के कारण इसका ना कोई लक्ष्य है और ना ही प्रयोजन। ऐसे में सवाल यह है कि क्या करें और क्या नहीं ? ( what to do and what not to do )अतः यह आवश्यक हो जाता है कि हमें अपनी समस्त शक्तियों का प्रयोग, स्वार्थ की परिधि से बाहर रखकर लोकमंगल के प्रयोजन से करना चाहिए।

 

जिंदगी जीने के लिए क्या  चाहिए, जिससे कि ना सिर्फ हम अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त कर सकें वरन विश्वस्त और प्रामाणिक सिद्ध हो सकें । हम ऐसी जीवन प्रक्रिया जी कर दिखाएं कि आने वाली पीढ़ी के लिए  एक आदर्श स्थापित कर सकें। जीवन जीने के लिए क्या जरूरी है। हमारे जीवन मूल्यों में ईमानदारी, सहृदयता, निडरता ,देश भक्ति, परस्पर प्रेम,  सहानुभूति और परमात्मा पर अगाध विश्वास आदि होना परम आवश्यक है।


इन्हीं संदर्भों को लेकर हम क्या करें और क्या नहीं ? (what do’s and don’ts ).

यह श्रंखला मैं जीवन में इन जीवन मूल्यों को बदलने के लिए प्रारंभ कर रहा हूं । मेरा आप सभी से निवेदन है कृपया इन को ध्यान से पढ़ें, समझे और करें इन दृष्टांतो, कहानियों तथा आत्म विश्लेषणों से यह भी समझने में मदद मिलेगी  कि हम क्या करें और क्या नहीं ?

 

 

1 आदर्श  मित्रता का एक बखान:


पदमभूषण आचार्य श्री शिवपूजन सहाय के कथनानुसार आज मैं आदर्श  मित्रता का एक बखान कर रहा हूं। हिंदी साहित्य के युग प्रवर्तक भारतेंदु हरिश्चंद्र खड्गविलास प्रेस के संस्थापक बाबू श्री रामदीन सिंह जी के परम मित्र थे। भारतेंदु जी अत्यंत उदार व्यक्ति थे और उनकी उदारता की अनेकों कहानियां प्रसिद्ध है। वे अपने सरल स्वभाव की वजह से अधिकतर ऋण ग्रस्त हो जाते थे क्योंकि वह मुक्त-हस्त होकर खर्च किया करते थे। इस स्वभाव के कारण उनकी सारी संपत्ति समाप्त हो गई और उसके अलावा डेढ़ लाख रुपया का ऋण  भी एक सज्जन का रह गया। जिसकी चर्चा उन्होंने अपने परिवार में किसी से नहीं की थी। एक दिन उन्होंने अपने अभिन्न मित्र बाबू रामदीन सिंह को बुलाकर अपनी सारी बातें बताईं और उनसे कहा कि—“जिन सज्जन के रुपए हैं वे कभी मुझसे मांगने नहीं आए इस कारण से मुझे इस ऋण के ना चुकाने का और भी बड़ा दुख हो रहा है।“ भारतेंदु के सरल स्वभाव से परिचित बाबू साहब ने तुरंत कहा—अच्छा तो यार चुकाना अब मेरी जिम्मेदारी रही आप इसकी तनिक भी चिंता ना करें और इस ओर से बिल्कुल निश्चिंत रहकर भगवान का ध्यान स्मरण करें।“

बाबू रामदीन सिंह के द्वारा इस प्रकार ऋण चुका देने की बात सुनकर लाखों की संपत्ति लुटा देने वाले भारतेंदु की आंखों में आंसू बहने लगे। ऐसी स्थिति में उन्होंने कागज का एक टुकड़ा बाबू रामदीन सिंह के हाथों में दिया जिसमें लिखा था-  मेरी सारी पुस्तकों 175 के प्रकाशन का सर्वाधिकार खड्गविलास प्रेस को ही है।

बाबू रामदीन सिंह ने उस कागज को पढ़ा और तुरंत फाड़ कर उन्हीं के सामने फेंक दिया और कहायह तो मित्रता निभाना नहीं हुआ व्यापार हुआ।“

यह दोनों आदर्श मित्र धन्य हैं और धन्य है इस प्रकार की निस्वार्थ मित्रता।

इस प्रकार मित्रता की कसौटी पर यदि हम देखें जो सच्चे मित्र मात्र एक दूसरे को देने का ही काम करते हैं , एक दूसरे के प्रति समर्पित रहते हैं , तभी वह मित्रता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। हमको भी अपनी मित्रता सहृदयता प्रेम और निस्वार्थ भाव से अवश्य निभाना चाहिए।

मित्र का दुख मेरा दुख और मित्र का सुख मेरा सुख इस भाव को अपना लेने पर हमें इस मित्रता के संबंध को चिरस्थाई करने से कोई नहीं रोक सकता।

 

2 गरीब और ईमानदारी:


आज दूसरा आख्यान श्री एम एल शर्मा जी के द्वारा प्रस्तुत किया गया था जिसको मैं ईमानदारी के संदर्भ में यहां पर उल्लेख कर रहा हूं

वह बताते हैं की एक बार मुझे कुछ प्लास्टिक के डिब्बों एवं स्टील के बर्तनों की खरीदारी करनी थी और इसके लिए मैं अपने नाती के साथ बाजार में एक दुकान पर  गया। नवरात्रि के समय अष्टमी- नवमी पर बाजारों में बहुत भीड़ होती है, उसी प्रकार काफी भीड़ थी, जब मैं दुकान पर पहुंचा।

मैंने अपना सामान दुकानदार को नोट करा दिया और उसने मुझसे आधा घंटे प्रतीक्षा करने का बोला तो मैं उसी दुकान में एक तरफ खड़ा हो गया।

उसी समय मेरी दृष्टि एक महिला पर पड़ी जो दुकानदार से दो-चार मिनट अपनी भाषा में झगड़ती और फिर एक तरफ बैठकर रोने लगती थी।

मेरे देखते- देखते ऐसा तीन- चार बार हो चुका था और वह दुकानदार उसकी कोई परवाह नहीं कर रहा था। ना जाने क्यों मैं उस महिला के आंसू देख कर व्याकुल हो गया और जब मैं खुद को नहीं रोक पाया तो उस से जानना चाहा कि आखिर क्या मामला है। महिला की आवाज और भाषा उसकी परेशानी के कारण मुझे स्पष्ट समझ नहीं रही थी। लेकिन जितना मैं समझ पाया उसके अनुसार, उस महिला ने अपना सामान खरीदा और भुगतान करते समय उसने दुकानदार को एक की जगह ₹500 के दो नोट गलती से दे दिए और अब वह ₹500 का एक नोट वापस मांग रही थी। दुकानदार यह बात मानने को बिल्कुल तैयार नहीं था और बार-बार उस महिला को बोल रहा था कि एक नोट तुमसे कहीं गिर गया होगा। ऐसी स्थिति में महिला कुछ बोलती और फिर बैठ कर रोने लगती।

वेशभूषा से महिला गरीब परिवार की जान पड़  रही थी। लेकिन उसकी दृढ़ता और आंसू उसकी ईमानदारी का बखान कर रहे थे।

मेरे मन में उसकी सहायता करने की इच्छा हुई और मैंने ₹500 का एक नोट निकालकर उसको देना चाहा तो वह और भी जोर से रोने लगी। उसने उस नोट को काफी प्रयत्न करने के पश्चात भी मुझसे नहीं लिया और दुकानदार की ओर इशारा करती रही जिससे यह प्रतीत होता था वह दुकानदार से ही लेना चाहती है। दुकानदार अभी भी उसकी कोई परवाह नहीं कर रहा था।

मेरा सामान अभी पैक  नहीं हुआ था, इस प्रकार 15 मिनट और बीत गए। मैंने एक तरकीब निकाली और चुपके से ₹500 का नोट मैंने दुकानदार को पकड़ा दिया और इशारों- इशारों में उसको देने के लिए कह दिया।

थोड़ी देर के पश्चात दुकानदार ने वह नोट उस महिला को दिया तो उसने उसे लेने से मना करते हुए धीरे-धीरे बताया कि ₹500 नहीं केवल ₹100 चाहिए।

एक घंटे के इस घटनाक्रम के पश्चात पता चला कि उस महिला ने ₹200 का सामान लेकर ₹500 का नोट दिया था, जिसमें दुकानदार ने गलती से ₹300 के स्थान पर उस महिला को मात्र ₹200 वापस किए थे अब दुकानदार को भी धीरे-धीरे याद रहा था और उसने उस महिला को एक ₹100 का नोट दे दिया। जिसे लेकर वह अपने आंसू पोंछते हुई अपने घर को चली गई।

मैं उससे बस इतना पूछ पाया कि उसके पति क्या करते हैं तो उसने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया  अखबार बेचते हैं।

यही ईमानदारी की एक मिसाल है और उस देवी को मेरा प्रणाम है जिसे ₹500 के नोट की जगह अपनी मेहनत का ₹100 का नोट अधिक मूल्यवान लगा।

What to do and don’ts in life in hindi लाइफ को कैसे जीना चाहिए ?

हमारी परिस्थितियां कैसी भी हो लेकिन हमको सदैव अपने जीवन में ईमानदारी का पालन करना चाहिए , ईमानदारी पर विश्वास करना चाहिए और ईमानदारी से ही जीवन जीना चाहिए।

 

 

3 अपरचितों से सहायता:


   इसी प्रकार श्री मूलचंद सोमानी के द्वारा अपरचित व्यक्तियों द्वारा की गई सहायता के संबंध में एक घटना का विवरण मिलता है। उनके अनुसार--

यह घटना 20 फरवरी 2018 मंगलवार की है। घटना मेरे साले श्री विमल जी मूंदड़ा दिल्ली निवासी के साथ हुई थी। वे 19 फरवरी 2018 को अपने परिचित के सुपौत्र के विवाह समारोह हेतु उदयपुर गए थे। दिनांक 20 फरवरी को सुबह विवाह समारोह से विदाई लेकर वापस दिल्ली आने के लिए वे एयरपोर्ट जा रहे थे। उस समय उनके साथ गाड़ी की आगे की सीट पर उनका एक मित्र एवं  ड्राइवर बैठा था और पीछे की सीट पर वे स्वयं बैठे थे। उस समय अचानक हाईवे पर पीछे से तेजी से आती हुई एक गाड़ी ने जबरदस्त टक्कर मार दी और दूसरी ओर से रहे ट्रक से भी उनकी गाड़ी की जबरदस्त भिड़ंत हो गई। इसमें उनकी गाड़ी तो चकनाचूर हो ही गई साथ ही आगे वाली सीट पर बैठे दोनों सज्जन घटनास्थल पर ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। विमल जी पूर्णतया घायल हो गए थे और प्रभु की कृपा से जीवित बच गए।

   तेज रफ्तार जिंदगी ही महानगरों की संस्कृति बन गई है और इसमें संवेदनहीनता, स्वार्थपरता को बहुत अधिक बढ़ावा मिला है। महानगरों में ऐसी दुर्घटनाओं को देख कर भी लोग अपनी आंखें फेर लेते हैं। किंतु ऐसी स्थिति में भी एक अपरिचित गाड़ी के ड्राइवर ने उनको गाड़ी से निकाल कर, फोन से उनके बड़े भाई को दिल्ली में सूचित किया। और उसके बाद उन  सज्जन ड्राइवर ने उपचार करा कर उन्हें अस्पताल छोड़ा एवं पुनः दिल्ली फोन किया कि अब मैं जा रहा हूं। हम उस सज्जन ड्राइवर के जीवन पर्यंत ऋणी रहेंगे। जब तक हमारे परिचित लोग अस्पताल पहुंच गए और उनमें से एक परिचित के साथ विमल जी दिल्ली गए। हमारे लिए वह सज्जन ड्राइवर भगवान के द्वारा भेजा हुआ दूत  ही था जिसने आकर उनके प्राणों की रक्षा की अन्यथा अधिक रक्तस्राव होने से कुछ भी हो सकता था।

यह घटना यहीं समाप्त नहीं होती है, उदयपुर में इलाज के दौरान अचानक एक अपरिचित सज्जन महिला आयीं और उन्होंने ₹10000 गुप्त रूप में दान में जमा किए और बोल कर गईं कि इनका तुरंत इलाज शुरू किया जाए। हमें तो अस्पताल का बिल आने पर पता चला तो हम उन सज्जन महिला के भी जीवन भर ऋणी रहेंगे। साथ ही इस घटना से हमें पूरा विश्वास हो गया की यदि परमात्मा की कृपा हो तो वह हमें बड़ी से बड़ी विपत्तियों से भी बचा लेता है। साथ ही समाज में आज भी ऐसे लोग हैं जो अपरिचित व्यक्ति की सहायता करना अपना धर्म और नैतिक कर्तव्य समझते हैं, वह भी गुप्त रूप से।

इस घटना से यह सीखने को मिलता है :--

  हमको जहां भी आवश्यक हो वहां पर लोगों की मदद करना चाहिए और ऐसा करते समय किसी भी प्रकार के सम्मान की आशा नहीं करना चाहिए। हमको निश्छल और निस्वार्थ  भाव से यह सोचना चाहिए कि परमात्मा ने दूसरों की सहायता के लिए ही हमको यहां पर भेजा है। किसी की भी विपत्ति में सहायता करने मैं हमको कभी संकोच नहीं करना चाहिए और निसंकोच भाव से यह कार्य करना चाहिए।

 

जीवन जीने के सूत्र उपर्युक्त वर्णित घटनाओं से हमें यह सिखाते हैं कि हमको निस्वार्थ मित्रता, ईमानदारी पर विश्वास, दूसरों की सहायता एवं सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना चाहिए। जिंदगी जीने  के तरीके ही हमारी  जिंदगी को आसान बनाने के तरीके तथा जीवन मूल्य बन जाते हैं। इन्हीं जीवन मूल्यों के साथ में हमें पूर्ण समर्पण भाव और उत्कृष्टता के साथ जीवन को जीना चाहिए।


क्या करें और क्या नहीं ? ( What to do and don’ts in hindi ) इस विषय पर मैं अपने जीवन में संकलित और भी जानकारियां आपके समक्ष प्रस्तुत करता रहूंगा। ये जीवन जीने के सूत्र हमारी जिंदगी को आसान बना सकते हैं आपको इस पोस्ट से यदि क्या करें क्या ना करें?  इस विषय पर जानकारी रोचक और महत्वपूर्ण लगी हो तो कृपया इसको अपने मित्रों के साथ अवश्य साझा कीजिये , साथ ही अपनी टिप्पणी भी कमेंट बॉक्स में अवश्य कीजिये ।

आपका शुभेच्छु : राघवेंद्र

 


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1 टिप्पणियाँ:

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Deb971
admin
12 जुलाई 2020 को 3:19 am ×

Nice1. Its informative.

Congrats bro Deb971 you got PERTAMAX...! hehehehe...
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